CBSE Class 12 Economics Chapter 6: भुगतान संतुलन (Balance of Payments) NCERT Solutions
यह समाधान CBSE कक्षा 12 अर्थशास्त्र के अध्याय 6, 'खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन' के लिए हिंदी में विस्तृत स्पष्टीकरण प्रदान करते हैं। ये समाधान छात्रों को व्यापार शेष, चालू खाता संतुलन, आधिकारिक आरक्षित निधि, मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दर, अवमूल्यन और मूल्यह्रास जैसी महत्वपूर्ण अवधारणाओं को समझने में मदद करते हैं। इसमें विनिमय दर निर्धारण के तंत्र और स्वर्णमान के तहत स्वचालित समायोजन की व्याख्या भी शामिल है। प्रत्येक प्रश्न का उत्तर स्पष्ट और संक्षिप्त तरीके से दिया गया है, जिसमें आवश्यक सूत्र और उदाहरण शामिल हैं। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी के लिए भुगतान संतुलन की जटिलताओं को समझने और याद रखने में सहायता करेंगे।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | Economics. |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 6. खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन |
Chapter summary
कक्षा 12 अर्थशास्त्र के अध्याय 6, 'खुली अर्थव्यवस्था - भुगतान संतुलन' के लिए ये NCERT समाधान, भुगतान संतुलन की अवधारणाओं पर केंद्रित हैं। इनमें व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन के बीच अंतर, आधिकारिक आरक्षित निधि की भूमिका, मौद्रिक बनाम वास्तविक विनिमय दरें, और अवमूल्यन तथा मूल्यह्रास के बीच भेद शामिल हैं। समाधान यह भी बताते हैं कि कैसे नम्य विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दरें निर्धारित होती हैं और स्वर्णमान के तहत स्वचालित समायोजन कैसे काम करता था। यह अध्याय छात्रों को अंतर्राष्ट्रीय अर्थशास्त्र के महत्वपूर्ण पहलुओं को समझने में मदद करता है।
Learning outcomes
- व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन के बीच अंतर को समझना।
- आधिकारिक आरक्षित निधि की भूमिका और महत्व का विश्लेषण करना।
- मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दरों के बीच भेद करना और उनकी प्रासंगिकता को समझना।
- अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच अंतर स्पष्ट करना।
- नम्य विनिमय दर प्रणाली में विनिमय दर निर्धारण की प्रक्रिया को समझना।
- स्वर्णमान के तहत भुगतान संतुलन के स्वचालित समायोजन तंत्र की व्याख्या करना।
Topics covered
Paper topics
- भुगतान संतुलन
- व्यापार शेष
- चालू खाता संतुलन
- आधिकारिक आरक्षित निधि
- मौद्रिक विनिमय दर
- वास्तविक विनिमय दर
- विनिमय दर निर्धारण
- नम्य विनिमय दर
- स्वर्णमान
- स्वचालित युक्ति
- अवमूल्यन
- मूल्यह्रास
Important topics
- भुगतान संतुलन की अवधारणा
- चालू खाता बनाम पूंजी खाता
- मौद्रिक बनाम वास्तविक विनिमय दर
- नम्य विनिमय दर प्रणाली में निर्धारण
- अवमूल्यन और मूल्यह्रास में अंतर
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
संतुलित व्यापार शेष (Balanced Trade Balance) का तात्पर्य उस स्थिति से है जब किसी देश के लिए वस्तुओं का निर्यात (Exports of Goods) और वस्तुओं का आयात (Imports of Goods) बिल्कुल बराबर होता है। इसे सूत्र के रूप में इस प्रकार व्यक्त किया जा सकता है:
संतुलित व्यापार शेष = वस्तुओं का निर्यात - वस्तुओं का आयात = 0
दूसरी ओर, चालू खाता संतुलन (Current Account Balance) एक व्यापक अवधारणा है। इसमें न केवल वस्तुओं का व्यापार शामिल होता है, बल्कि सेवाओं का व्यापार, आय (जैसे मजदूरी और लाभ) और एकतरफा हस्तांतरण (जैसे उपहार और सहायता) भी शामिल होते हैं। चालू खाता संतुलन तब संतुलित माना जाता है जब वस्तुओं के निर्यात, सेवाओं के निर्यात और हस्तांतरण प्राप्तियों का कुल योग, वस्तुओं के आयात, सेवाओं के आयात और हस्तांतरण भुगतानों के कुल योग के बराबर होता है। इसे सूत्र के रूप में इस प्रकार दर्शाया जा सकता है:
चालू खाता संतुलन = (वस्तुओं का निर्यात + सेवाओं का निर्यात + हस्तांतरण प्राप्तियाँ) - (वस्तुओं का आयात + सेवाओं का आयात + हस्तांतरण भुगतान) = 0
संक्षेप में, व्यापार शेष केवल माल के व्यापार पर केंद्रित है, जबकि चालू खाता शेष माल, सेवाओं, आय और हस्तांतरणों सहित सभी चालू लेन-देन को शामिल करता है।
प्रश्न 2
आधिकारिक आरक्षित निधि का लेन-देन (Official Reserve Transaction) से तात्पर्य किसी देश के केंद्रीय बैंक या मौद्रिक प्राधिकरण द्वारा विदेशी मुद्रा भंडार, जैसे कि विदेशी मुद्रा, सोना और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के विशेष आहरण अधिकार (SDRs) में की गई खरीद या बिक्री से है। ये लेन-देन भुगतान संतुलन (Balance of Payments) में घाटे या अधिशेष को ठीक करने के लिए किए जाते हैं।
भुगतान संतुलन में महत्व:
- घाटे की स्थिति में: जब किसी देश का भुगतान संतुलन घाटे में होता है (अर्थात, आयात और अन्य विदेशी भुगतान निर्यात और अन्य विदेशी प्राप्तियों से अधिक होते हैं), तो घाटे को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार में अपनी विदेशी मुद्रा भंडार (आधिकारिक आरक्षित निधि) को बेच सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की आपूर्ति बढ़ती है और घरेलू मुद्रा की मांग बढ़ती है, जिससे विनिमय दर स्थिर रखने में मदद मिलती है। आधिकारिक आरक्षित निधि में यह कमी 'आधिकारिक आरक्षित निधि में कमी' या 'भुगतान संतुलन घाटा' कहलाती है।
- अधिशेष की स्थिति में: जब किसी देश का भुगतान संतुलन अधिशेष में होता है (अर्थात, निर्यात और अन्य विदेशी प्राप्तियाँ आयात और अन्य विदेशी भुगतानों से अधिक होती हैं), तो केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा बाजार से विदेशी मुद्रा खरीद सकता है और अपनी आधिकारिक आरक्षित निधि को बढ़ा सकता है। इससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है और घरेलू मुद्रा की आपूर्ति बढ़ती है, जो विनिमय दर को स्थिर रखने में सहायक होता है। आधिकारिक आरक्षित निधि में यह वृद्धि 'आधिकारिक आरक्षित निधि में वृद्धि' या 'भुगतान संतुलन अधिशेष' कहलाती है।
इस प्रकार, आधिकारिक आरक्षित निधि का लेन-देन भुगतान संतुलन में स्थिरता बनाए रखने और विनिमय दर को प्रबंधित करने के लिए एक महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में कार्य करता है।
प्रश्न 3
मौद्रिक विनिमय दर (Nominal Exchange Rate): यह वह विनिमय दर है जो एक देश की मुद्रा की दूसरी देश की मुद्रा के संदर्भ में विनिमय की दर को दर्शाती है। इसमें विभिन्न देशों के मूल्य स्तरों में अंतर को ध्यान में नहीं रखा जाता है। उदाहरण के लिए, यदि 1 अमेरिकी डॉलर = 80 रुपये, तो यह एक मौद्रिक विनिमय दर है। यह मुद्रास्फीति के प्रभावों से मुक्त नहीं होती है।
वास्तविक विनिमय दर (Real Exchange Rate): यह वह विनिमय दर है जो दो देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं की सापेक्षिक कीमतों को ध्यान में रखती है। यह मौद्रिक विनिमय दर को दोनों देशों के मूल्य स्तरों के अनुपात से समायोजित करके प्राप्त की जाती है। यह मुद्रास्फीति के प्रभावों से मुक्त होती है और क्रय शक्ति समानता (Purchasing Power Parity) का आकलन करने में मदद करती है।
प्रासंगिकता:
यदि आपको घरेलू वस्तु या विदेशी वस्तु खरीदने का निर्णय लेना हो, तो वास्तविक विनिमय दर अधिक प्रासंगिक होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि वास्तविक विनिमय दर आपको यह बताती है कि वास्तव में एक देश की वस्तुओं की टोकरी को दूसरे देश की वस्तुओं की टोकरी के मुकाबले खरीदने के लिए कितनी मुद्रा की आवश्यकता होगी, जिसमें दोनों देशों के मूल्य स्तरों का प्रभाव शामिल होता है। मौद्रिक विनिमय दर केवल मुद्राओं के विनिमय की दर बताती है, लेकिन यह नहीं कि कौन सी वस्तु सस्ती है, जब तक कि आप दोनों देशों के मूल्य स्तरों को ध्यान में न रखें।
प्रश्न 4
हमें निम्नलिखित जानकारी दी गई है:
- मौद्रिक विनिमय दर: ₹ 1 = 1.25 येन
- जापान में कीमत स्तर (PJapan) = 3
- भारत में कीमत स्तर (PIndia) = 1.2
चरण 1: मौद्रिक विनिमय दर को येन प्रति रुपया से रुपये प्रति येन में बदलें।
यदि ₹ 1 = 1.25 येन है, तो 1 येन का मूल्य रुपये में होगा:
1 येन = ₹ = ₹ 0.80
यह रुपये में येन की मौद्रिक विनिमय दर है।
चरण 2: वास्तविक विनिमय दर की गणना करें।
वास्तविक विनिमय दर का सूत्र है:
वास्तविक विनिमय दर = मौद्रिक विनिमय दर (घरेलू मुद्रा प्रति विदेशी मुद्रा) × कीमत स्तर
यहाँ, हम जापानी वस्तु की कीमत भारतीय वस्तु के संदर्भ में देख रहे हैं, इसलिए हम रुपये प्रति येन की दर का उपयोग करेंगे और कीमत स्तरों का अनुपात लेंगे।
वास्तविक विनिमय दर = (रुपये प्रति येन की मौद्रिक दर) ×
वास्तविक विनिमय दर =
वास्तविक विनिमय दर =
वास्तविक विनिमय दर = 0.32
निष्कर्ष:
वास्तविक विनिमय दर 0.32 है। इसका मतलब है कि 1 येन की कीमत, भारत में 0.32 रुपये के बराबर वस्तुओं के बराबर है। दूसरे शब्दों में, जापानी वस्तुएँ भारतीय वस्तुओं की तुलना में औसतन 0.32 गुना महंगी हैं (कीमत स्तरों के समायोजन के बाद)।
प्रश्न 5
डेविड ह्यूम (David Hume) ने 1752 में स्वर्णमान (Gold Standard) के तहत भुगतान संतुलन (Balance of Payments) को स्वचालित रूप से ठीक करने वाली एक युक्ति की व्याख्या की थी। यह युक्ति मुख्य रूप से धातुओं (सोने और चांदी) के प्रवाह और कीमतों पर इसके प्रभाव पर आधारित थी।
युक्ति की कार्यप्रणाली:
- भुगतान घाटे की स्थिति में: यदि किसी देश का भुगतान संतुलन घाटे में है, तो इसका मतलब है कि वह देश अन्य देशों से अधिक आयात कर रहा है और उन्हें सोने के रूप में भुगतान कर रहा है। इस सोने के बहिर्वाह के कारण, घाटे वाले देश में मुद्रा की आपूर्ति कम हो जाएगी। मुद्रा की आपूर्ति में कमी से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें गिरेंगी (मुद्रास्फीति कम होगी या अपस्फीति होगी)। जब कीमतें गिरती हैं, तो घरेलू वस्तुएँ विदेशी वस्तुओं की तुलना में सस्ती हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, देश का निर्यात बढ़ेगा और आयात घटेगा।
- भुगतान अधिशेष की स्थिति में: इसके विपरीत, यदि किसी देश का भुगतान संतुलन अधिशेष में है, तो वह अन्य देशों से सोना प्राप्त करेगा। सोने के इस अंतर्वाह से देश में मुद्रा की आपूर्ति बढ़ेगी। मुद्रा की आपूर्ति में वृद्धि से वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ेंगी (मुद्रास्फीति होगी)। जब कीमतें बढ़ती हैं, तो घरेलू वस्तुएँ विदेशी वस्तुओं की तुलना में महंगी हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, देश का निर्यात घटेगा और आयात बढ़ेगा।
संतुलन की प्राप्ति: यह प्रक्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि सोने का प्रवाह रुक न जाए और भुगतान संतुलन अपने आप ठीक न हो जाए। इस प्रकार, सापेक्षिक कीमतों में परिवर्तन के माध्यम से, स्वर्णमान के तहत एक स्वचालित तंत्र काम करता था जो भुगतान संतुलन में स्थिरता लाता था और स्थिर विनिमय दर बनाए रखता था।
प्रश्न 6
नम्य विनिमय दर व्यवस्था (Flexible Exchange Rate System), जिसे फ्लोटिंग एक्सचेंज रेट सिस्टम भी कहा जाता है, में विनिमय दर का निर्धारण मुख्य रूप से विदेशी मुद्रा बाजार में मांग (Demand) और पूर्ति (Supply) की शक्तियों द्वारा होता है।
निर्धारण प्रक्रिया:
- मांग (Demand): विदेशी मुद्रा की मांग तब उत्पन्न होती है जब देश के निवासी विदेशी वस्तुओं और सेवाओं का आयात करना चाहते हैं, विदेशी संपत्तियों में निवेश करना चाहते हैं, या विदेशी मुद्रा के रूप में ऋण चुकाना चाहते हैं। विदेशी मुद्रा की मांग इसकी अपनी कीमत (विनिमय दर) के साथ विपरीत रूप से संबंधित होती है; अर्थात, जब विनिमय दर अधिक होती है (घरेलू मुद्रा सस्ती होती है), तो विदेशी मुद्रा की मांग कम होती है, और जब विनिमय दर कम होती है (घरेलू मुद्रा महंगी होती है), तो विदेशी मुद्रा की मांग अधिक होती है।
- पूर्ति (Supply): विदेशी मुद्रा की पूर्ति तब होती है जब विदेशी निवासी देश की वस्तुओं और सेवाओं का आयात करते हैं, देश की संपत्तियों में निवेश करते हैं, या देश के निवासियों को ऋण चुकाते हैं। विदेशी मुद्रा की पूर्ति इसकी अपनी कीमत (विनिमय दर) के साथ सीधे तौर पर संबंधित होती है; अर्थात, जब विनिमय दर अधिक होती है (घरेलू मुद्रा सस्ती होती है), तो विदेशी मुद्रा की पूर्ति अधिक होती है, और जब विनिमय दर कम होती है (घरेलू मुद्रा महंगी होती है), तो विदेशी मुद्रा की पूर्ति कम होती है।
संतुलन बिंदु: विनिमय दर वह स्तर होती है जहाँ विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति बराबर हो जाती है। यदि मांग पूर्ति से अधिक हो जाती है, तो घरेलू मुद्रा का मूल्य गिरता है (मूल्यह्रास होता है)। यदि पूर्ति मांग से अधिक हो जाती है, तो घरेलू मुद्रा का मूल्य बढ़ता है (अभि.वृद्धि होती है)। इस प्रकार, बाजार की शक्तियाँ लगातार विनिमय दर को संतुलन बिंदु पर समायोजित करती रहती हैं।
प्रश्न 7
अवमूल्यन (Devaluation) और मूल्यह्रास (Depreciation) दोनों ही घरेलू मुद्रा के मूल्य में विदेशी मुद्राओं की तुलना में कमी को दर्शाते हैं, लेकिन इनके कारण और प्रक्रिया में महत्वपूर्ण अंतर हैं:
अवमूल्यन (Devaluation):
- परिभाषा: अवमूल्यन सरकार या केंद्रीय बैंक द्वारा जानबूझकर, एक आधिकारिक निर्णय के तहत, अपनी घरेलू मुद्रा के मूल्य को विदेशी मुद्राओं के मुकाबले कम करना है।
- कारण: यह आमतौर पर तब किया जाता है जब विनिमय दरें निश्चित (fixed) या प्रबंधित (managed) होती हैं, और सरकार भुगतान संतुलन घाटे को ठीक करने, निर्यात को बढ़ावा देने या आयात को हतोत्साहित करने के लिए यह कदम उठाती है।
- प्रक्रिया: यह एक नीतिगत निर्णय है और इसे सरकारी अधिसूचना द्वारा लागू किया जाता है।
मूल्यह्रास (Depreciation):
- परिभाषा: मूल्यह्रास घरेलू मुद्रा के मूल्य में विदेशी मुद्राओं की तुलना में होने वाली कमी है जो बाजार की शक्तियों (विदेशी मुद्रा की मांग और पूर्ति) के कारण होती है।
- कारण: यह तब होता है जब विदेशी मुद्रा की मांग घरेलू मुद्रा की पूर्ति से अधिक हो जाती है, या जब घरेलू मुद्रा की पूर्ति विदेशी मुद्रा की मांग से अधिक हो जाती है। यह बाजार की ताकतों का परिणाम है, न कि किसी सरकारी नीति का।
- प्रक्रिया: यह एक स्वचालित प्रक्रिया है जो विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार होती रहती है।
मुख्य अंतर सारणीबद्ध रूप में:
| आधार | अवमूल्यन (Devaluation) | मूल्यह्रास (Depreciation) |
|---|---|---|
| कारण | सरकारी नीतिगत निर्णय | बाजार की शक्तियाँ (मांग और पूर्ति) |
| विनिमय दर प्रणाली | निश्चित या प्रबंधित विनिमय दर | नम्य (फ्लोटिंग) विनिमय दर |
| उद्देश्य | भुगतान संतुलन को ठीक करना, निर्यात बढ़ाना | बाजार संतुलन को दर्शाना |
| प्रकृति | जानबूझकर किया गया कार्य | स्वचालित प्रक्रिया |
Common mistakes
- व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन के बीच भ्रमित होना।
- मौद्रिक और वास्तविक विनिमय दरों के बीच अंतर को ठीक से न समझना।
- अवमूल्यन और मूल्यह्रास के बीच सूक्ष्म अंतर को अनदेखा करना।
- विनिमय दर निर्धारण के पूर्ति और मांग के सिद्धांतों को गलत समझना।
Revision tips
- प्रत्येक अवधारणा के लिए दिए गए सूत्रों और परिभाषाओं को याद करें।
- अंतर वाले प्रश्नों (जैसे व्यापार शेष बनाम चालू खाता) के लिए तुलनात्मक तालिकाएँ बनाएँ।
- विनिमय दर निर्धारण और समायोजन तंत्र के रेखाचित्रों का अभ्यास करें।
- वास्तविक विनिमय दर गणना जैसे संख्यात्मक उदाहरणों को हल करने का अभ्यास करें।
Practice MCQs
Q1. संतुलित व्यापार शेष का क्या अर्थ है?
Explanation: संतुलित व्यापार शेष तब होता है जब किसी देश के वस्तुओं के निर्यात का मूल्य उसके वस्तुओं के आयात के मूल्य के ठीक बराबर होता है।
Q2. चालू खाता संतुलन में निम्नलिखित में से क्या शामिल नहीं है?
Explanation: चालू खाता संतुलन में वस्तुओं, सेवाओं और हस्तांतरणों के लेन-देन शामिल होते हैं। पूंजीगत प्राप्तियाँ पूंजी खाते का हिस्सा हैं।
Q3. आधिकारिक आरक्षित निधि का उपयोग मुख्य रूप से किसके लिए किया जाता है?
Explanation: आधिकारिक आरक्षित निधि का उपयोग भुगतान संतुलन में असंतुलन को दूर करने के लिए किया जाता है, जिससे विनिमय दर को स्थिर रखने में मदद मिलती है।
Q4. वास्तविक विनिमय दर किन कारकों को ध्यान में रखती है?
Explanation: वास्तविक विनिमय दर मौद्रिक विनिमय दर को विभिन्न देशों के मूल्य स्तरों के अनुपात से समायोजित करती है, जिससे क्रय शक्ति समानता का पता चलता है।
Q5. अवमूल्यन (Devaluation) किसके द्वारा किया जाता है?
Explanation: अवमूल्यन एक जानबूझकर किया गया सरकारी निर्णय है जिसमें घरेलू मुद्रा का मूल्य विदेशी मुद्राओं के मुकाबले कम किया जाता है, जबकि मूल्यह्रास बाजार की शक्तियों से होता है।
Frequently asked questions
कक्षा 12 अर्थशास्त्र में भुगतान संतुलन क्या है?
भुगतान संतुलन एक देश के निवासियों और शेष विश्व के बीच एक निश्चित अवधि में सभी आर्थिक लेन-देन का एक व्यवस्थित विवरण है। इसमें वस्तुओं, सेवाओं, आय और हस्तांतरणों के साथ-साथ वित्तीय संपत्तियों और देनदारियों के लेन-देन शामिल हैं।
व्यापार शेष और चालू खाता संतुलन में मुख्य अंतर क्या है?
व्यापार शेष केवल वस्तुओं के निर्यात और आयात के बीच का अंतर है, जबकि चालू खाता संतुलन में वस्तुओं, सेवाओं, आय और हस्तांतरणों के सभी लेन-देन शामिल होते हैं।
वास्तविक विनिमय दर क्यों महत्वपूर्ण है?
वास्तविक विनिमय दर यह मापने के लिए अधिक प्रासंगिक है कि घरेलू और विदेशी वस्तुओं की सापेक्षिक कीमतें क्या हैं, क्योंकि यह मौद्रिक विनिमय दर को मूल्य स्तरों के अंतर से समायोजित करती है। यह अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा का एक बेहतर संकेतक है।
अवमूल्यन और मूल्यह्रास में क्या अंतर है?
अवमूल्यन सरकार द्वारा जानबूझकर घरेलू मुद्रा के मूल्य को कम करना है, जबकि मूल्यह्रास बाजार की शक्तियों (मांग और पूर्ति) के कारण घरेलू मुद्रा के मूल्य में होने वाली कमी है।
नम्य विनिमय दर प्रणाली कैसे काम करती है?
नम्य विनिमय दर प्रणाली में, विनिमय दर विदेशी मुद्रा बाजार में मांग और पूर्ति की शक्तियों द्वारा निर्धारित होती है, और सरकार का इसमें कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं होता है।
स्वर्णमान के तहत भुगतान संतुलन कैसे ठीक होता था?
स्वर्णमान के तहत, भुगतान घाटे वाले देश से सोने का बहिर्वाह होता था, जिससे कीमतें और लागतें गिरती थीं, निर्यात सस्ते हो जाते थे और आयात महंगे, जिससे संतुलन स्वतः बहाल हो जाता था।
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