कक्षा 12 राजनीति विज्ञान: अध्याय 1 शीत युद्ध का दौर - NCERT समाधान
यह पृष्ठ कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1, 'शीत युद्ध का दौर' के लिए विस्तृत NCERT समाधान प्रस्तुत करता है। इसमें शीत युद्ध की प्रकृति, महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा, सैन्य गठबंधनों के कारण, और गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल किया गया है। समाधान स्पष्ट रूप से बताते हैं कि कैसे शीत युद्ध ने हथियारों की होड़ को बढ़ावा दिया, लेकिन साथ ही निशस्त्रीकरण और हथियारों पर नियंत्रण की आवश्यकता को भी जन्म दिया। यह अध्याय यह भी पड़ताल करता है कि क्या शीत युद्ध केवल विचारधाराओं का टकराव था या शक्ति के लिए संघर्ष। ये समाधान छात्रों को परीक्षा की तैयारी के लिए विषय की गहरी समझ विकसित करने में मदद करेंगे।
Quick info
| Board | CBSE |
|---|---|
| Class | Class 12 |
| Subject | राजनीति विज्ञान |
| Session | 2026 |
| Language | Hindi |
| Type | NCERT Solutions |
| Chapter | 1. शीत युद्ध का दौर |
Chapter summary
कक्षा 12 राजनीति विज्ञान के अध्याय 1 'शीत युद्ध का दौर' के ये NCERT समाधान शीत युद्ध की उत्पत्ति, विशेषताओं और वैश्विक प्रभाव पर केंद्रित हैं। इसमें महाशक्तियों के सैन्य गठबंधन, गुटनिरपेक्ष आंदोलन के सिद्धांत और शीत युद्ध के दौरान हथियारों की होड़ तथा नियंत्रण की प्रक्रियाओं का विश्लेषण किया गया है। समाधान छात्रों को शीत युद्ध के जटिल कारणों और परिणामों को समझने में सहायता करते हैं, जो परीक्षा की तैयारी के लिए आवश्यक हैं।
Learning outcomes
- शीत युद्ध की गलत धारणाओं को पहचानना।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के मुख्य उद्देश्यों को समझना।
- महाशक्तियों द्वारा सैन्य गठबंधन बनाने के कारणों का विश्लेषण करना।
- शीत युद्ध के दौरान हथियारों की होड़ और नियंत्रण की प्रक्रियाओं के बीच संबंध को स्पष्ट करना।
- शक्ति संघर्ष और विचारधारा के टकराव के बीच अंतर को समझना।
Topics covered
Paper topics
- शीत युद्ध की परिभाषा और प्रकृति
- महाशक्तियों के बीच प्रतिस्पर्धा
- सैन्य गठबंधन (जैसे नाटो, वारसा संधि)
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन (NAM)
- हथियारों की होड़
- हथियारों पर नियंत्रण और निशस्त्रीकरण
- विचारधारा बनाम शक्ति संघर्ष
- नव-उपनिवेशवाद का विरोध
- छोटे देशों की भूमिका
- भारत की विदेश नीति
Important topics
- शीत युद्ध की प्रकृति और कारण
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्य और महत्व
- सैन्य गठबंधनों के लाभ और हानियाँ
- हथियारों की होड़ और निशस्त्रीकरण की प्रक्रिया
- शक्ति संघर्ष बनाम विचारधारा का टकराव
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Questions and Solutions
प्रश्न 1
- (क) यह संयुक्त राज्य अमरीका, सोवियत संघ और उनके साथी देशों के बीच की एक प्रतिस्पर्धा थी?
- (ख) यह महाशक्तियों के बीच विचारधाराओं को लेकर एक युद्ध था।
- (ग) शीतयुद्ध ने हथियारों की होड़ शुरू की।
- (घ) अमरीका और सोवियत संघ सीधे युद्ध में शामिल थे।
कथन (घ) गलत है। शीतयुद्ध संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के बीच एक वैचारिक, राजनीतिक और आर्थिक प्रतिस्पर्धा थी, लेकिन दोनों महाशक्तियाँ सीधे तौर पर एक-दूसरे के खिलाफ बड़े पैमाने पर सैन्य युद्ध में शामिल नहीं हुईं। उन्होंने अप्रत्यक्ष रूप से विभिन्न देशों में संघर्षों का समर्थन किया (प्रॉक्सी युद्ध) और हथियारों की होड़ में लगे रहे, लेकिन उनके बीच सीधा युद्ध नहीं हुआ। अन्य कथन (क), (ख), और (ग) शीतयुद्ध की प्रकृति का सही वर्णन करते हैं।
प्रश्न 2
- (क) उपनिवेशवाद से मुक्त हुए देशों को स्वतंत्र नीति अपनाने में समर्थ बनाना।
- (ख) किसी भी सैन्य संगठन में शामिल होने से इंकार करना।
- (ग) वैश्विक मामलों में तटस्थता की नीति अपनाना।
- (घ) वैश्विक आर्थिक असमानता की समाप्ति पर ध्यान केंद्रित करना।
कथन (ग) गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों पर पूरी तरह से प्रकाश नहीं डालता। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य केवल वैश्विक मामलों में तटस्थ रहना नहीं था, बल्कि यह नव-उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद और नस्लवाद का विरोध करने, स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखने और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने पर भी केंद्रित था। जबकि आंदोलन के सदस्य किसी भी सैन्य गुट में शामिल नहीं होते थे (जैसा कि कथन (ख) में है), उनका लक्ष्य केवल तटस्थता बनाए रखना नहीं था, बल्कि सक्रिय रूप से अंतरराष्ट्रीय शांति और सहयोग को बढ़ावा देना था। कथन (क) और (घ) आंदोलन के महत्वपूर्ण उद्देश्य थे।
प्रश्न 3
- (क) गठबंधन के सदस्य देशों को अपने भू-क्षेत्र में महाशक्तियों के सैन्य अड्डे के लिए स्थान देना जरूरी था।
- (ख) सदस्य देशों को विचारधारा और रणनीति दोनों स्तरों पर महाशक्ति का समर्थन करना था।
- (ग) जब कोई राष्ट्र किसी एक सदस्य-देश पर आक्रमण करता था तो इसे सभी सदस्य देशों पर आक्रमण समझा जाता था।
- (घ) महाशक्तियाँ सभी सदस्य देशों को अपने परमाणु हथियार विकसित करने में मदद करती थीं।
यहाँ दिए गए कथनों का विश्लेषण इस प्रकार है:
- (क) सही - सैन्य गठबंधन में सदस्य देशों से अक्सर यह अपेक्षा की जाती थी कि वे अपने क्षेत्र में महाशक्तियों को सैन्य अड्डे स्थापित करने की अनुमति दें, जिससे महाशक्तियों को अपनी सैन्य उपस्थिति और प्रभाव बढ़ाने में मदद मिलती थी।
- (ख) सही - गठबंधन के सदस्य देशों से अपेक्षा की जाती थी कि वे न केवल महाशक्ति की सैन्य रणनीति का पालन करें, बल्कि उसकी राजनीतिक और वैचारिक दिशा का भी समर्थन करें, ताकि गुट की एकता बनी रहे।
- (ग) सही - यह एक प्रमुख विशेषता थी, विशेष रूप से नाटो (NATO) जैसे गठबंधनों में, जहाँ एक सदस्य पर हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता था और सामूहिक सुरक्षा की गारंटी देता था।
- (घ) गलत - महाशक्तियाँ आमतौर पर अपने सबसे उन्नत और विनाशकारी हथियार, जैसे परमाणु हथियार, केवल अपने तक ही सीमित रखती थीं। वे सदस्य देशों को सीमित मात्रा में पारंपरिक हथियार या सैन्य सहायता प्रदान कर सकती थीं, लेकिन परमाणु हथियार विकसित करने में मदद करना उनकी नीति के विरुद्ध था।
प्रश्न 4
- (क) पोलैंड
- (ख) फ्रांस
- (ग) जापान
- (घ) नाइजीरिया
- (ड) उत्तरी कोरिया
- (च) श्रीलंका
शीतयुद्ध के दौरान विभिन्न देशों की संबद्धता इस प्रकार थी:
- (क) पोलैंड - सोवियत संघ के साम्यवादी गुट में। पोलैंड पूर्वी यूरोप का एक प्रमुख देश था जो सोवियत प्रभाव क्षेत्र में था और वारसा संधि का सदस्य था।
- (ख) फ्रांस - संयुक्त राज्य अमरीका के पूंजीवादी गुट में। फ्रांस पश्चिमी यूरोप का एक प्रमुख देश था और नाटो (NATO) का संस्थापक सदस्य था, जो पश्चिमी गुट का हिस्सा था।
- (ग) जापान - संयुक्त राज्य अमरीका के पूंजीवादी गुट में। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने अमरीका के साथ सुरक्षा संधि की और पश्चिमी गुट का एक महत्वपूर्ण आर्थिक और राजनीतिक सहयोगी बन गया।
- (घ) नाइजीरिया - गुटनिरपेक्ष आंदोलन में। नाइजीरिया स्वतंत्र राष्ट्रों के आंदोलन का एक प्रमुख सदस्य था और उसने किसी भी महाशक्ति के गुट में शामिल होने से इनकार कर दिया था।
- (ड) उत्तरी कोरिया - सोवियत संघ के साम्यवादी गुट में। उत्तरी कोरिया को सोवियत संघ और चीन से महत्वपूर्ण समर्थन प्राप्त था और वह साम्यवादी खेमे का हिस्सा था।
- (च) श्रीलंका - गुटनिरपेक्ष आंदोलन में। श्रीलंका भी गुटनिरपेक्ष आंदोलन का एक सक्रिय सदस्य था और उसने शीतयुद्ध के दौरान अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखी।
प्रश्न 5
शीतयुद्ध के दौरान हथियारों की होड़ और हथियारों पर नियंत्रण, दोनों प्रक्रियाएँ एक साथ विकसित हुईं, जिनके कारण निम्नलिखित थे:
हथियारों की होड़ के कारण:
- परमाणु बम का आविष्कार: द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में अमरीका द्वारा जापान पर परमाणु बमों का प्रयोग एक निर्णायक मोड़ था। इसने महाशक्तियों के बीच एक नई और विनाशकारी हथियारों की दौड़ शुरू कर दी।
- प्रतिद्वंद्विता और अविश्वास: संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के बीच तीव्र वैचारिक मतभेद, राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता और गहरा अविश्वास था। प्रत्येक महाशक्ति दूसरे को कमजोर करने और अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने के लिए सैन्य शक्ति बढ़ाना चाहती थी।
- सुरक्षा की भावना: दोनों महाशक्तियाँ और उनके सहयोगी देश अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे। उन्हें डर था कि यदि वे पीछे रह गए तो प्रतिद्वंद्वी उन पर हावी हो जाएगा। इस डर ने उन्हें लगातार नए और अधिक घातक हथियार विकसित करने के लिए प्रेरित किया।
- सैन्य गठबंधन: महाशक्तियों ने अपने सहयोगियों को हथियार प्रदान किए, जिससे हथियारों का प्रसार हुआ और वैश्विक स्तर पर हथियारों की होड़ तेज हो गई। छोटे देश भी अपनी सुरक्षा के लिए इन महाशक्तियों से हथियार खरीदने लगे।
- राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और शक्ति प्रदर्शन: सैन्य शक्ति को राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और वैश्विक प्रभाव का प्रतीक माना जाता था। महाशक्तियाँ अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए हथियारों की दौड़ में लगी रहीं।
हथियारों पर नियंत्रण (निशस्त्रीकरण) के कारण:
- विनाशकारी क्षमता का भय: परमाणु हथियारों की अत्यधिक विनाशकारी क्षमता ने दोनों महाशक्तियों को यह एहसास कराया कि यदि युद्ध छिड़ गया तो इसके परिणाम अत्यंत भयावह होंगे और मानव जाति का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
- युद्ध की अनिश्चितता: दोनों ही गुट इस बात को लेकर आश्वस्त नहीं थे कि वे किसी भी संभावित युद्ध में जीत हासिल कर लेंगे। युद्ध की अनिश्चितता ने उन्हें बातचीत और नियंत्रण की ओर प्रेरित किया।
- आर्थिक बोझ: हथियारों की अंधी दौड़ पर भारी आर्थिक व्यय हो रहा था, जिसका बोझ दोनों महाशक्तियों और उनके सहयोगियों पर पड़ रहा था। निशस्त्रीकरण से इस आर्थिक बोझ को कम किया जा सकता था।
- दुर्घटना का खतरा: परमाणु दुर्घटनाओं, हथियारों के गलत हाथों में पड़ने या गलत अनुमानों के कारण अनजाने में युद्ध शुरू होने का खतरा हमेशा बना रहता था। इस खतरे को कम करने के लिए नियंत्रण आवश्यक था।
- अंतर्राष्ट्रीय दबाव और कूटनीति: संयुक्त राष्ट्र संघ और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर निशस्त्रीकरण के लिए लगातार दबाव बन रहा था। दोनों महाशक्तियाँ अंतर्राष्ट्रीय समुदाय में अपनी छवि सुधारने और शांति स्थापित करने के लिए कुछ हद तक नियंत्रण के उपायों पर सहमत हुईं।
इस प्रकार, शीतयुद्ध ने जहाँ एक ओर महाशक्तियों को अपनी सैन्य शक्ति बढ़ाने के लिए प्रेरित किया, वहीं दूसरी ओर इसके विनाशकारी परिणामों के भय ने उन्हें हथियारों पर नियंत्रण स्थापित करने के लिए भी मजबूर किया।
प्रश्न 6
महाशक्तियाँ छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन कई रणनीतिक और भू-राजनीतिक कारणों से रखती थीं। इसके तीन प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:
- संसाधनों तक पहुँच और नियंत्रण: छोटे देश अक्सर महत्वपूर्ण प्राकृतिक संसाधनों, जैसे तेल, खनिज और अन्य सामरिक सामग्री के स्रोत होते थे। सैन्य गठबंधन के माध्यम से महाशक्तियाँ इन संसाधनों तक अपनी पहुँच सुनिश्चित कर सकती थीं और उन पर नियंत्रण बनाए रख सकती थीं, जो उनकी अर्थव्यवस्था और सैन्य शक्ति के लिए आवश्यक थे।
- सैन्य अड्डे और सामरिक स्थिति: छोटे देशों में सैन्य अड्डे स्थापित करने से महाशक्तियों को अपनी सेनाओं और हथियारों को तैनात करने के लिए रणनीतिक स्थान मिल जाते थे। ये अड्डे प्रतिद्वंद्वी महाशक्ति की गतिविधियों पर नजर रखने, अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करने और त्वरित सैन्य कार्रवाई करने में सहायक होते थे।
- अंतर्राष्ट्रीय समर्थन और कूटनीतिक लाभ: छोटे देशों के साथ गठबंधन बनाने से महाशक्तियों को अंतर्राष्ट्रीय मंचों, जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ में अधिक समर्थन मिलता था। यह उनके प्रभाव को बढ़ाता था और उनकी कूटनीतिक स्थिति को मजबूत करता था। इसके अतिरिक्त, ये छोटे देश अक्सर महाशक्तियों को आर्थिक सहायता भी प्रदान कर सकते थे या उनके सैन्य खर्चों में योगदान दे सकते थे।
प्रश्न 7
यह कथन कि शीतयुद्ध सीधे तौर पर शक्ति के लिए संघर्ष था और इसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं था, पूरी तरह से सही नहीं है। हालाँकि शक्ति संघर्ष एक प्रमुख तत्व था, लेकिन विचारधारा का टकराव भी शीतयुद्ध का एक अभिन्न अंग था। मैं इस कथन से आंशिक रूप से सहमत हूँ, क्योंकि शक्ति संघर्ष और विचारधारा का टकराव दोनों ही एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए थे।
शक्ति संघर्ष का पहलू:
- द्वितीय विश्व युद्ध के बाद, संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ दो प्रमुख महाशक्तियों के रूप में उभरे। दोनों ही वैश्विक मंच पर अपना वर्चस्व स्थापित करना चाहते थे और एक-दूसरे को पीछे छोड़ना चाहते थे। यह शक्ति के लिए एक सीधा संघर्ष था, जहाँ प्रत्येक महाशक्ति अपने प्रभाव क्षेत्र का विस्तार करना चाहती थी और वैश्विक व्यवस्था पर अपना प्रभुत्व जमाना चाहती थी।
विचारधारा का पहलू:
- संयुक्त राज्य अमरीका पूंजीवाद, लोकतंत्र और उदारवाद का समर्थक था, जबकि सोवियत संघ साम्यवाद, एक-दलीय शासन और समाजवादी अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता था। ये दोनों विचारधाराएँ मौलिक रूप से भिन्न थीं और एक-दूसरे के विपरीत थीं। महाशक्तियाँ न केवल अपनी शक्ति बढ़ाना चाहती थीं, बल्कि अपनी विचारधारा को विश्व में फैलाना और स्थापित करना भी चाहती थीं। वे एक-दूसरे की विचारधारा के प्रसार को रोकने का भी प्रयास कर रही थीं।
निष्कर्ष:
यह कहना कि इसका विचारधारा से कोई संबंध नहीं था, गलत होगा। विचारधारा ने इस संघर्ष को एक नैतिक और वैचारिक आयाम दिया, जिससे यह केवल शक्ति का खेल न रहकर दो भिन्न विश्वदृष्टिकोणों के बीच का टकराव बन गया।
उदाहरण के समर्थन में:
1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान संयुक्त राज्य अमरीका का रवैया इस बात का एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे शक्ति संघर्ष और राष्ट्रीय हित विचारधारा पर हावी हो सकते हैं। युद्ध के दौरान, अमरीका ने पाकिस्तान का समर्थन करने के लिए अपना जंगी बेड़ा बंगाल की खाड़ी में भेज दिया। हालाँकि अमरीका लोकतांत्रिक और पूंजीवादी विचारधारा का समर्थक था, और पाकिस्तान एक सैन्य तानाशाही के अधीन था, फिर भी अमरीका ने अपने सामरिक और शक्ति-आधारित हितों को प्राथमिकता दी। भारत उस समय सोवियत संघ का मित्र था, लेकिन अमरीका का यह कदम यह दर्शाता है कि महाशक्तियाँ अपने राष्ट्रीय हितों और शक्ति संतुलन को बनाए रखने के लिए किसी भी पक्ष का समर्थन कर सकती थीं, भले ही वह उनकी घोषित विचारधारा के अनुरूप न हो। यह घटना दर्शाती है कि शीतयुद्ध में शक्ति और राष्ट्रीय हित अक्सर विचारधारा से अधिक महत्वपूर्ण कारक थे।
Common mistakes
- शीत युद्ध को केवल दो महाशक्तियों के बीच सीधा युद्ध समझना।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों को केवल तटस्थता तक सीमित मानना।
- सैन्य गठबंधनों के लाभों को केवल सैन्य सहायता तक सीमित रखना।
- हथियारों की होड़ और हथियारों पर नियंत्रण को परस्पर विरोधी प्रक्रियाएं मानना।
Revision tips
- प्रत्येक प्रश्न के उत्तर को ध्यान से पढ़ें और मुख्य बिंदुओं को नोट करें।
- शीत युद्ध के कारण और परिणाम को समझने के लिए उदाहरणों पर विशेष ध्यान दें।
- गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों और सैन्य गठबंधनों के कारणों की तुलना करें।
- हथियारों की होड़ और नियंत्रण की प्रक्रियाओं के बीच के संबंध को रेखांकित करें।
Practice MCQs
Q1. शीत युद्ध के बारे में कौन-सा कथन गलत है?
Explanation: शीत युद्ध में अमरीका और सोवियत संघ सीधे सैन्य टकराव में शामिल नहीं थे, बल्कि वे प्रॉक्सी युद्धों और अप्रत्यक्ष प्रतिस्पर्धाओं में उलझे थे।
Q2. निम्नलिखित में से कौन-सा कथन गुटनिरपेक्ष आंदोलन के उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डालता?
Explanation: गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य केवल वैश्विक मामलों में तटस्थता बनाए रखना नहीं था, बल्कि स्वतंत्र विदेश नीति अपनाना और नव-उपनिवेशवाद का विरोध करना भी था।
Q3. सैन्य गठबंधन के सदस्य देशों के लिए क्या आवश्यक था?
Explanation: गठबंधन के सदस्य देशों को अक्सर अपनी धरती पर महाशक्तियों के सैन्य अड्डों की मेजबानी करनी पड़ती थी।
Q4. शीत युद्ध के कारण हथियारों की होड़ क्यों शुरू हुई?
Explanation: परमाणु बमों के आविष्कार के बाद, महाशक्तियों ने अपनी श्रेष्ठता साबित करने और प्रतिद्वंद्वी को रोकने के लिए हथियारों का विकास तेज कर दिया, जिससे हथियारों की होड़ बढ़ी।
Q5. महाशक्तियाँ छोटे देशों के साथ सैन्य गठबंधन क्यों रखती थीं?
Explanation: महाशक्तियाँ छोटे देशों के साथ गठबंधन करके महत्वपूर्ण संसाधन प्राप्त करती थीं, अपने सैन्य संचालन को सुगम बनाती थीं और उनसे आर्थिक सहायता भी प्राप्त करती थीं।
Frequently asked questions
शीत युद्ध का दौर कब से कब तक चला?
शीत युद्ध का दौर मोटे तौर पर द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति (1945) से लेकर सोवियत संघ के विघटन (1991) तक चला।
शीत युद्ध में कौन-सी दो महाशक्तियाँ प्रमुख थीं?
शीत युद्ध में संयुक्त राज्य अमरीका (USA) और सोवियत संघ (USSR) प्रमुख महाशक्तियाँ थीं।
गुटनिरपेक्ष आंदोलन क्या है?
गुटनिरपेक्ष आंदोलन एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है जिसके सदस्य देश किसी भी प्रमुख सैन्य गठबंधन (जैसे अमेरिका या सोवियत संघ के नेतृत्व वाले गुट) में शामिल नहीं होते हैं और अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हैं।
क्या शीत युद्ध में सीधे युद्ध हुए थे?
नहीं, शीत युद्ध में संयुक्त राज्य अमरीका और सोवियत संघ के बीच सीधे तौर पर कोई बड़ा सैन्य युद्ध नहीं हुआ था, हालांकि उन्होंने प्रॉक्सी युद्धों में एक-दूसरे का समर्थन किया।
हथियारों की होड़ से क्या तात्पर्य है?
हथियारों की होड़ से तात्पर्य विभिन्न देशों, विशेषकर महाशक्तियों के बीच, एक-दूसरे से अधिक शक्तिशाली और विनाशकारी हथियार बनाने और जमा करने की प्रतिस्पर्धा से है।
क्या शीत युद्ध केवल विचारधाराओं का टकराव था?
हालांकि विचारधाराओं का टकराव एक महत्वपूर्ण पहलू था, शीत युद्ध मुख्य रूप से शक्ति, प्रभाव और वैश्विक वर्चस्व के लिए संघर्ष भी था।
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